जज की कुर्सी छोड़ बने संन्यासी, सर्प-मगरमच्छ से थी मित्रता, जानें खपड़िया बाबा की कहानी
बलिया: बलिया की धरती सिर्फ आजादी के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यहां ऐसे संतों की तपोभूमियां भी हैं. जिनकी कहानियां लोककथाओं की तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती है. बैरिया के दियारा क्षेत्र में स्थित खपड़िया बाबा का आश्रम भी ऐसी ही एक अद्भुत जगह है. जहां आस्था, तपस्या और रहस्यमयी कथाओं का अनोखा संगम देखने को मिलता है.
लोकल-18 के लिए स्टोरी की तलाश में हम बलिया के बैरिया क्षेत्र की शांत गलियों और खेतों के बीच से गुजर रहे थे. तभी दूर से हरिकीर्तन की मधुर ध्वनि कानों में पड़ी. उत्सुकता हमें एक भव्य और दिव्य आश्रम के द्वार तक ले आई. जैसे ही भीतर कदम रखा वातावरण में एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस हुई. पूछताछ करने पर पता चला कि यह किसी साधारण संत का आश्रम नहीं, बल्कि खपड़िया बाबा की तपोस्थली है.
एक ऐसे महात्मा की जिन्होंने न्यायाधीश जैसी प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर संन्यास का मार्ग चुना और तपस्या के बल पर ऐसी सिद्धियां प्राप्त कीं कि जहरीले जीव-जंतु भी उनके मित्र माने जाने लगे. खपड़िया बाबा की यह कहानी केवल आस्था की नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और आध्यात्मिक शक्ति की एक ऐसी गाथा है जो आज भी हजारों श्रद्धालुओं को इस आश्रम तक खींच लाती है.
खपड़िया बाबा के बारे में मान्यता है कि उन्होंने अपने तपोबल से जल और थल के विभिन्न जहरीले और गैर-जहरीले जीव-जंतुओं से मित्रता कर ली थी. आज उनका यह आश्रम न केवल बलिया जनपद का बड़ा आकर्षण केंद्र है, बल्कि एक प्रमुख दर्शनीय पर्यटन स्थल और सशक्त आध्यात्मिक केंद्र के रूप में भी स्थापित हो चुका है. प्रदेश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. आश्रम परिसर में संत के जीवन से जुड़े प्रसंगों का ऐसा जीवंत चित्रण है, जिसे देखकर आस्था से जुड़ी लाखों भावनाएं स्वतः जाग उठती है.
प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार यह स्थल बलिया जनपद के बैरिया तहसील अंतर्गत श्रीपालपुर संकीर्तन नगर गांव में स्थित है. यहां ब्रह्मलीन श्री श्री 1008 श्री स्वामी मुनीश्वरानंद जी महाराज, जिन्हें खपड़िया बाबा के नाम से जाना जाता है उनकी समाधि है. यह स्थान बलिया के लिए एक महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र भी बन चुका है.
इतिहासकार बताते है कि खपड़िया बाबा का जन्म वर्ष 1830 में बंगाल प्रांत के एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था. उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और लगभग 8 वर्ष तक न्यायाधीश के पद पर कार्य किया. उनकी पत्नी का नाम राजराजेश्वरी देवी था. लगभग 42 वर्ष की आयु में उन्हें वैराग्य हो गया और उन्होंने जज की नौकरी छोड़कर संन्यास ले लिया.
खपड़िया बाबा ने दो बार गोमुख से गंगासागर तक गंगा नदी के किनारे-किनारे पदयात्रा की. इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि वाराणसी से लेकर बिहार के भागलपुर तक गंगा तटवर्ती गृहस्थों में अतिथि सेवा और साधु-संतों की सेवा की भावना कमजोर पड़ती जा रही है. इसी भावना को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से उन्होंने बलिया के श्रीपालपुर संकीर्तन नगर में आश्रम की स्थापना की और यहीं कठोर तपस्या प्रारंभ की.
डॉ. कौशिकेय के अनुसार विरक्ति के बाद की इन पदयात्राओं ने खपड़िया बाबा को अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की. कहा जाता है कि सर्प, बिच्छू, शेर, चीता और मगरमच्छ जैसे जल और थल के खतरनाक जीव-जंतुओं से भी उनकी घनिष्ठ मित्रता हो गई थी. आगे चलकर वे अत्यंत सिद्ध महात्मा के रूप में विख्यात हुए.
खपड़िया बाबा के निधन (23 जनवरी 1986) के बाद उनके प्रख्यात शिष्य स्वामी हरिहरानंद महाराज आश्रम की सेवा संभाल रहे है और यहीं निवास करते है. उन्होंने अपने गुरु खपड़िया बाबा के जीवन से जुड़ी घटनाओं पर आधारित एक विस्तृत चित्रावली तैयार करवाई है. जिसमें बाबा के अलग-अलग रूपों और प्रसंगों का विशेष चित्रण है. यह चित्रावली बाबा के जीवन को आंखों के सामने जीवंत कर देती है.
आज खपड़िया बाबा का यह आश्रम केवल एक पर्यटन स्थल भर नहीं, बल्कि एक सशक्त आध्यात्मिक केंद्र और महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित हो चुका है. जहां हर किसी को एक बार अवश्य पहुंचना चाहिए.