न निकलने का रास्ता था, न बचने का मौका… लखनऊ कोचिंग अग्निकांड में बड़ा खुलासा
ओलिवर फ्रेड्रिक
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में स्थित एक कोचिंग और एनीमेशन संस्थान में लगी भीषण आग ने 15 छात्रों की जान ले ली. इस हादसे के बाद जांच एजेंसियों का फोकस अब आग लगने की वजह से ज्यादा उन प्रशासनिक और सुरक्षा खामियों पर आ गया है, जिनकी वजह से आग लगने के बाद लोगों की जान जाना लगभग तय हो गया था. दमकल विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘बचाव अभियान के दौरान सबसे बड़ी चुनौती वहां तक पहुंचना थी. अंदर फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए दमकल कर्मियों को वैकल्पिक रास्ते बनाने पड़े और बिल्डिंग के कुछ हिस्सों को तोड़ना पड़ा.’
कोचिंग नहीं, मौत का कुआं
शुरुआती जांच से एक परेशान करने वाली तस्वीर सामने आई है. कहा जा रहा है कि आग फैलने के बाद इस बिल्डिंग में लोगों के बचने की गुंजाइश बहुत कम थी. शुरुआती जांच में सामने आया है कि जिस इमारत में आग लगी, वहां इमरजेंसी एग्जिट यानी किसी आपातकालीन स्थिति में बाहर निकालने की कोई व्यवस्था नहीं थी. पूरी इमारत में आने-जाने के लिए केवल एक ही सीढ़ी थी, जो एंट्री और एग्जिट दोनों का काम कर रही थी. आग लगने के बाद सैकड़ों लोगों के लिए बाहर निकलने का यही एकमात्र रास्ता बचा, जिससे भगदड़ और अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हो गई. आशंका जताई जा रही है कि ऑटोमैटिक गेट सिस्टम ने भी छात्रों को वक्त रहते बाहर निकलने से रोक दिया.
जांच अधिकारियों के लिए अब मुख्य सवाल यह नहीं है कि आग कैसे लगी, बल्कि यह है कि बिल्डिंग में फंसे लोगों के पास बाहर निकलने के इतने कम विकल्प क्यों थे.
रिहायशी इमारत कैसे बन गया कर्मिशयल कॉम्प्लेक्स?
जांच में यह भी सामने आया है कि जिस भवन में हादसा हुआ, उसे मूल रूप से रिहायशी उपयोग के लिए मंजूरी मिली थी. बाद में वहां कोचिंग सेंटर, एनीमेशन स्टूडियो, लाइब्रेरी और दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जाने लगीं. अब यह जांच की जा रही है कि भवन का उपयोग बदलने के दौरान अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था या नहीं.
लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि भवन को आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृति मिली थी. इसके बाद सवाल उठ रहे हैं कि संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की और सुरक्षा मानकों की निगरानी में कहीं लापरवाही तो नहीं बरती गई.
15 लोगों की मौत, कई ने इमारत से लगाई छलांग
इस हादसे में मरने वालों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है. बचाव दलों को इमारत के अलग-अलग हिस्सों, वॉशरूम और बंद कमरों से शव बरामद हुए. बताया जा रहा है कि कई लोग घने धुएं से बचने के लिए इन जगहों पर छिप गए थे. मृतकों में अधितर युवा छात्र और ट्रेनी थे, जो क्लास और इंटर्नशिप के लिए यहां आए थे.
SIT करेगी पूरे मामले की जांच
उत्तर प्रदेश सरकार ने घटना की विस्तृत जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है. यह टीम आग लगने के कारणों के साथ-साथ उन प्रशासनिक चूकों की भी जांच करेगी, जिनकी वजह से हादसा इतना बड़ा रूप ले सका.
सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा. हर स्तर पर जवाबदेही तय की जाएगी.’
अपनों को तलाश करते पीड़ित परिवारों
बिल्डिंग से जुड़े नियमों की जानकारी रखने वाले एक पूर्व फायर सेफ्टी कंसल्टेंट ने कहा, ‘जब रिहायशी इमारतों को बिना जरूरी सुरक्षा इंतजाम किए एजुकेशनल या कमर्शियल जगहों में बदला जाता है, तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है. लोगों की संख्या तो बहुत बढ़ जाती है, लेकिन बाहर निकलने के सिस्टम में कोई बदलाव नहीं किया जाता.’
हालांकि, पीड़ित परिवारों के लिए इस बात से कोई खास राहत नहीं मिलती नहीं दिखी. कई लोगों ने अस्पतालों और हादसे वाली जगह के बाहर घंटों तक अपने उन करीबियों के बारे में जानकारी मांगते रहे, जो किसी आम दिन की तरह घर से क्लास के लिए निकले थे.
इन पीड़ितों में से कई पहली पीढ़ी के पढ़ने वाले छात्र थे, जो बेहतर नौकरी के मौकों की उम्मीद में प्रोफेशनल कोर्स और इंटर्नशिप कर रहे थे. उनकी मौत ने इस घटना को प्रशासन की बड़ी नाकामियों के एक प्रतीक में बदल दिया है.
अब जब एसआईटी ने अपनी जांच शुरू कर दी है, अधिकारियों के सामने मुख्य सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आग किस वजह से लगी, बल्कि यह भी है कि क्या यह त्रासदी बरसों से नज़रअंदाज़ की गई चेतावनियों और नियमों के उल्लंघन का नतीजा थी.