‘स्कूल टाइम खुद खाता था, अब अपने बच्चों को लाता हूं’, गाजीपुर में इस समोसे का इतना क्रेज

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‘स्कूल टाइम खुद खाता था, अब अपने बच्चों को लाता हूं’, गाजीपुर में इस समोसे का इतना क्रेज


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Ghazipur Samosa Mishra Bazar : गाजीपुर के मिश्र बाजार में आकाश शर्मा के ठेले पर जैसे ही समोसे छनकर ट्रे में आते हैं, ग्राहक जुटने लगते हैं. महंगाई के दौर में जहां हर जगह एक समोसा 8 से 10 रुपये का मिल रहा है, यहां आज भी सिर्फ 5 रुपये में समोसा मिल जाएगा. करीब 200 लोग रोज यहां समोसे का स्वाद लेने पहुंचे हैं. बारिश और सर्दी के मौसम में यह संख्या और भी बढ़ जाती है. डिमांड बंपर है. आकाश शर्मा कहते हैं कि मैं हमेशा समोसे छानता ही रहता हूं. मोहित बताते हैं कि हम जब स्कूल में थे, तब भी यहीं समोसे खाते थे. आज अपने बच्चे को खिलाने लाते हैं.

गाजीपुर के मिश्र बाजार में आकाश शर्मा के ठेले पर जैसे ही खौलते तेल से सुनहरे मिनी समोसे छनकर स्टील की थाली में आते हैं, खुशबू दूर तक फैल जाती है. ठेले पर स्वाद का असली जादू तब देखने को मिलता है जब समोसों को धीमी-मध्यम आंच पर तला जाता है. जल्दबाजी में तेज आंच पर तलने से समोसे का कुरकुरापन खत्म हो जाता है, इसलिए पिछले 25 सालों से वही पुराना पारंपरिक तरीका अपनाया जा रहा है. जाली पर रुकते ही अतिरिक्त तेल निकल जाता है और बचता है सिर्फ करारापन.

इस समोसे की खासियत ये भी है कि ये थोड़े छोटे साइज का है और इसकी डिमांड बंपर है. आकाश शर्मा कहते हैं कि मैं हमेशा समोसे छानता ही रहता हूं. महंगाई के इस दौर में जहां एक समोसा 10 रुपये से कम नहीं मिलता, यहां आज भी सिर्फ 5 रुपये में कुरकुरा समोसा परोसा जाता है. यही वजह है कि थाली सजते ही ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ती है. शाम को 4:00 बजे समोसे की खुशबू पूरे मिश्र बाजार में फैल जाती है और रात के 9:00 बजे तक यह खुशबू बनी रहती है.

समोसा बनाने की कोई मशीन नहीं, सब कुछ हाथों से तैयार होता है. मैदा गूंथने से लेकर समोसे की समकोण फोल्डिंग तक, हर काम में सालों का अनुभव झलकता है. रोजाना दर्जनों समोसे पहले टेबल पर कतारबद्ध सजते हैं और फिर खौलती कढ़ाई का रुख करते हैं. मोहित बताते हैं कि हम जब स्कूल में थे, तब भी यहीं खाते थे. आज बच्चे को खिलाने लाते हैं.

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कोचिंग जाने वाले युवा हों या मिश्र बाजार के स्थानीय व्यापारी, यह ठेला हर किसी के बजट में फिट बैठता है. हाथ में दोना थामे समोसे की पहली बाइट लेते ही चेहरा खिल उठता है. ग्राहकों का कहना है कि जमाना भले डिजिटल हो गया हो लेकिन 5 रुपये में ऐसा साथ पूरे शहर में कहीं नहीं मिलता है. 11वीं में पढ़ने वाले विकास ने बताया कि मैं 10 रुपये रोज बचा लेता हूं ताकि इनका समोसा खा सकूं.

जैसे-जैसे शाम ढलती है, कढ़ाई में समोसों के उतरने की रफ्तार बढ़ जाती है. आकाश शर्मा बताते हैं कि महज 10 मिनट के भीतर 20 से ज्यादा ग्राहक समोसे खाने पहुंच जाते हैं. दिनभर में लगभग 200 लोग इस ₹5 वाले समोसे का लुत्फ उठाते हैं. बारिश या ठंड के मौसम में तो कढ़ाई के पास जगह मिलना भी मुश्किल हो जाता है. आकाश बताते हैं कि कभी-कभी तो जब मैं ठेला समटने लगता हूं तब भी लोग आने लगते हैं. आकाश के मुताबिक, आज से 20 साल पहले यह ₹1 या ₹2 का समोसा था. आज भी उसी अंदाज में लोग उसी तरह खा रहे हैं.

यहां समोसा अकेले नहीं, बल्कि अपने दो खास साथियों के साथ मिलता है, खट्टी-मीठी इमली की चटनी और पूर्वांचल का खास आमड़े का चटका. ऊपर से छिड़का गया सिकुड़ा देसी मसाला. दोने में समोसा देखते ही मुंह में पानी आ जाता है. समोसे के साथ प्याज और चटनी का मिक्स कॉम्बो इसके स्वाद में जान फूंक देते हैं.

आकाश शर्मा बताते हैं कि करीब 10 साल पहले यही समोसा 2 रुपये में मिलता था. दो-तीन साल से इसकी कीमत नहीं बढ़ाई है. उनका कहना है कि कम मुनाफे के बावजूद वे चाहते हैं कि हर वर्ग का व्यक्ति कम कीमत में स्वादिष्ट नाश्ते का आनंद ले सके. यही भरोसा 25 साल पुराने इस ठेले की सबसे बड़ी पूंजी है. छोटे आकार की वजह से लोग एक साथ 3-4 समोसे आराम से खा लेते हैं.

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