अस्सी से आदिकेशव तक… जहां दर्शन मात्र से कट जाते हैं सारे पाप

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अस्सी से आदिकेशव तक… जहां दर्शन मात्र से कट जाते हैं सारे पाप


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Varanasi River Confluence: मोक्ष की नगरी काशी सिर्फ गंगा के किनारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वह अलौकिक केंद्र है जहां 11 पवित्र नदियों का जाल बिछा हुआ है. धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन शोधों के अनुसार, काशी के विभिन्न घाटों पर 5 प्रमुख नदियों के संगम स्थित हैं. अस्सी घाट पर देवी दुर्गा की तलवार से निकली ‘असि’ की धारा हो या पंचगंगा पर पांच नदियों का अदृश्य मिलन, वाराणसी का हर कोना आध्यात्मिक ऊर्जा से लबरेज है. आइए जानते हैं काशी के उन गुप्त और प्रकट संगमों के बारे में, जिनका उल्लेख स्कंदपुराण से लेकर आधुनिक शोधों तक में मिलता है.

वाराणसी के दक्षिण छोर में असि और गंगा नदी का संगम स्थल है. यह जगह धार्मिक लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है. असि जिसे वर्तमान में अस्सी घाट कहते हैं, प्राचीन समय में यहां दो नदियों का संगम दिखता था. हालांकि आज की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से असि नदी का डायवर्जन रविदास घाट के बगल में कर दिया गया है. लेकिन फिर भी ऐसी मान्यता है कि यहां आज भी विलुप्त स्थिति में असि नदी विद्यमान है.

देवी ने फेंका था तलवार

धार्मिक मान्यता है कि असि घाट पर ही देवी दुर्गा ने शुम्भ-निशुम्भ के वध के बाद अपनी तलवार फेंकी थी. इसी तलवार की धार से जल की धारा प्रवाहित हुई थी, जो असि नदी के तौर पर जानी जाती थी. यह घाट काशी का प्रमुख तीर्थ स्थल भी है. सुबह से शाम तक इस जगह पर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होते हैं. हर दिन इस तीर्थ पर हजारों लोग आते भी हैं.

पांच नदियों का संगम स्थल

इसके अलावा महाश्मशान मणिकर्णिका घाट के करीब पंचगंगा घाट है. नाम से ही स्पष्ट है कि इस जगह पांच नदियों का संगम स्थल था. कथाओं के मुताबिक, पंचगंगा घाट पर गंगा, यमुना, सरस्वती, किरणा और धूतपापा नदी का संगम स्थल है. इस जगह स्नान से हर पापों से मुक्ति मिल जाती है. यही वजह है कि यहां आस्था की डुबकी लगाने के लिए लोग आते हैं.

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गंगा-वरुणा का संगम स्थल

वहीं, वाराणसी के दक्षिण छोर पर आदिकेशव घाट है. इस घाट के बगल से वरुणा नदी का गंगा में संगम होता है. यह जगह श्री हरि विष्णु का तीर्थ स्थल है. धार्मिक कथाओं के अनुसार, इस जगह को काशी का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है. घाटों की श्रृंखला में आदिकेशव घाट काशी का पहला घाट कहा जाता है. इसके बाद 84 घाटों की अटूट श्रृंखला है. सिर्फ और सिर्फ काशी में घाटों की ऐसी श्रृंखला देखने को मिलती है.

भगवान विष्णु ने रखा था पग

इसी जगह प्रथम बार काशी आगमन पर भगवान विष्णु के पग पड़े थे. उसी स्थान पर आदि केशव का प्राचीन मंदिर भी स्थापित है, जहां भक्त पूजा-पाठ करते हैं. पूरे कार्तिक महीने में यहां विशेष अनुष्ठान होता है. इसके साथ ही भक्तों की भीड़ भी लगी रहती है. यह जगह विष्णु तीर्थ के तौर पर जानी जाती है. बताते चलें कि कार्तिक महीने में काशी के राजा श्री हरि विष्णु होते हैं.

11 नदियों के पांच संगम

काशी में कालगंगा, मंदाकिनी और गोदावरी नदी का संगम स्थल भी है. हालांकि यह नदियां अब कूप और तालाब के रूप में सीमित हो गई हैं. स्कन्दपुराण के काशी खंड में इसका उल्लेख भी है. हालांकि आज भी इन जगहों का विशेष धार्मिक महत्व है. यहां पूजा अनुष्ठान से हर मनोरथ की सिद्धि होती है. विशेष दिनों में यहां भक्तों की भीड़ भी देखने को मिलती है.

कूप के रूप में गोदावरी है विद्यमान

गोदावरी नदी का प्रवाह शहर के हृदय स्थल गोदौलिया पर था. हालांकि अब यह गोदावरी कूप के रूप में विद्यमान है. इस कूप में गंगा और गोदावरी नदी का जल है. ऐसी मान्यता है कि इस जल के छिड़काव से ही मनुष्य के हर पाप कट जाते हैं. इतना ही नहीं, उसके मोक्ष की राह भी आसान होती है. गोदावरी कूप के करीब भगवान शिव का प्राचीन मंदिर भी है. अधिमास के वक्त यहां विशेष पूजा होती है.

बीएचयू के विद्वान कर चुकें है शोध

वहीं मैदागिन पर मंदाकिनी नदी का प्रवाह था, जो गुप्त रूप से गंगा में जाकर मिलती थी. बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के विद्वानों की एक टीम ने काफी पहले इस पर एक शोध भी किया था. उनके शोध में ही काशी में 11 नदियों के 5 संगम स्थल होने की बात पर मुहर भी लगी थी. हालांकि इसका जिक्र पुराणों में भी है.



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