यूपी का एक ऐसा रेलवे पुल, जहां आज भी रात को लगता है सैकड़ों भूतों का मेला

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यूपी का एक ऐसा रेलवे पुल, जहां आज भी रात को लगता है सैकड़ों भूतों का मेला


मथुरा: उत्तर प्रदेश के मथुरा को धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही पवन और अद्भुत माना जाता है. कहा जाता है कि यहां श्री कृष्ण की लीलाओं का आज भी मंचन होता है, लेकिन भगवान श्री कृष्ण की इस धरा पर एक रेलवे घटना ने लोगों को डरने पर मजबूर कर दिया. जब उस घटना के बारे में सोचते हैं या लोगों से कहानी सुनते हैं, तो लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उस घटना ने बृज ही नहीं बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया था. आइए जानते हैं इस ग्राउंड रिपोर्ट में की वह घटना क्या थी जिसने पूरे मथुरा के साथ-साथ देश को हिला कर रख दिया था.

63 साल पहले की है घटना 

गोवर्धन के मुड़िया पूर्णिमा मेला को एक ऐतिहासिक और राजकीय मेले के नाम से जाना जाता है, लेकिन इस मेले में आने वाले लोग आज भी डरे हुए और सहमें हुए होते हैं, क्योंकि 63 साल पूर्व की वह घटना आज भी लोगों के मन में घर कर गई है. आज भी बुजुर्ग उस घटना को जब कहानी के तौर पर बताते हैं, तो लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, लोगों का खून जम जाता है. हालांकि, इससे पहले भी मुडिया मेले के साथ अनहौनी आपदा का इतिहास जुड़ा है. मुडिया पौनू मेला के साथ एक ऐसी घटना जुडी है, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. इस घटना के बाद सभी रेलवे पुल से देश भर में कैंचियां हटा दी गई थीं, लेकिन जो हुआ वह इतिहास में काला अध्याय लिख गया.

बात करीब 63 साल पहले की है. सन् 1962 की 17 जुलाई को मंगलवार का दिन था और उस दिन गुरू पूर्णिमा का पर्व था. उस समय आवागमन की व्यवस्थाएं भी ज्यादा नहीं थीं.

कैंची पुल पर हुई घटना से मच गया था कोहराम 

मथुरा में यमुना नदी को पार करने के लिए मात्र एक ही साधन था. रेलवे का पुल उस पर से पैदल चलने की व्यवस्था थी और ट्रेन का आवागमन भी होता था और सड़क भी थी. रेलवे के पुल के ऊपर रेलगाड़ी के निकलने भर को जगह थी. गाड़ी के निकलने के समय में सड़क को बंद कर दिया जाता था. रेलगाड़ी के ऊपर यदि कोई चढ़ जाता तो उसका घायल होना निश्चित ही था. 17 जुलाई मंगलवार 1962 का दिन मथुरा के इतिहास में और स्वतन्त्र भारत के इतिहास में रेलवे की यह पहली घटना थी, जब मुडिया पूनों यानी मुड़िया पूर्णिमा के दिन परिक्रमार्थी गिर्राज गोवर्धन की परिक्रमा करने को बड़ी संख्या में आते हैं. उस दिन भी भींड़ अधिक होने के कारण लोग रेल गाड़ी की छत्तों पर चढ़ कर यात्रा कर रहे थे. उस समय यह रेल मार्ग नोर्दन ईस्टन रेलवे का भाग था और इस मीटर गेज (छोटी लाइन) रेल मार्ग पर नोर्थ बंगाल न्यू जलपाईगुड़ी, असम तक की यात्राएं इस मार्ग से लोग किया करते थे.

किसी की गर्दन कट तो किसी का हाथ कटा

स्थानीय स्तर पर बरेली, इज्जतनगर तक के यात्री भी यातायात किया करते थे. मुड़िया पूर्णिमा मेला में रेल यातायात से पूर्व भी लोग पैदल ही तीर्थयात्रा करने के लिए आते थे. रेल मार्ग शुरू होने के बाद से लोग रेल का उपयोग करने लगे. आज यह रेल मार्ग ब्राडगेज (बड़ी लाइन) होने के बाद इसका इलैक्ट्रीफिकेशन भी हो चुका है. रेल हादसे को लगभग 63 साल बीत चुके हैं. उस समय के आज भी मौजूद लोगों की जुबान यह बताते-बताते लड़खड़ा जाती है कि मुड़िया पूर्णिमा के दिन 17 जुलाई मंगलवार की सुबह करीब चार बजे का समय था. यमुना नदी पर बने रेल के पुल पर तेजी के साथ एक सवारी गाड़ी गुजरी और देखते ही देखते सैकड़ों लोग जो रेलगाड़ी की छत पर बैठे थे, दुर्घटना का शिकार हो गये, कोई कुछ समझ पाता कि तब तक किसी की गर्दन कट गयी, तो किसी का हाथ कटा, किसी की टांग कटी चारों ओर चीख पुकार और बदहवास होकर इधर-उधर दौड़ते लोग देखे जा सकते थे. जो लोग दुर्घटना का शिकार हुए और गर्दन कटने के बाद भी कुछ समय के लिए वह नदी और आस पास इधर-उधर चलते देखे गये.

रेलवे कर्मचारियों ने छतों पर यात्रा करने से मना भी किया था

ऐसे भयानक हादसे का जिक्र करते हुए सुशील शर्मा जो वर्तमान में लन्दन में निवास करते हैं, उन्होंने बताया कि उस समय उनकी उम्र करीब 12-13 वर्ष की थी. घटना की जानकारी मिलते ही यमुना किनारे जाकर देखा था कि किस प्रकार से लोग एक साथ काल के गाल में समा गए थे तथा सैकड़ों लोग जीवन भर के लिए अपाहिज हो गए. इस घटना के सम्बन्ध में लम्बे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुडे रहे पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया ने बताया कि गोवर्धन की परिक्रमा करने के लिए हजारों लोग रेलगाड़ी के डिब्बों की छतों पर बैठकर परिक्रमा के लिए आ रहे थे. पिछले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो रेलवे कर्मचारियों ने छतों पर यात्रा करने से मना भी किया था, लेकिन किसी ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया. हर मुड़िया पूनों पर सभी रेलगाड़ियों की छतों पर बैठकर यात्री गोवर्धन परिक्रमा के लिए आते थे. हमेशा पुल से पहले ड्राइवर गाड़ी रोक देता था तथा यात्री ऊतर कर गोवर्धन जाने के लिए बस या अन्य साधनों का सहारा लेते थे.

खून से लाल हो गई थी गाड़ी 

ड्राइवर गुस्से में रेलगाड़ी को रेलवे पुल से तेजी से ले गया. उस समय पढ़ाई कर रहा था मगर मुझे इस घटना की यादें आज भी मेरे मन मस्तिष्क में स्टष्ट छवि के साथ है कि यात्रियों के न उतरने से रेलगाड़ी का ड्राइवर जो एक मुसलमान था, वह काफी गुस्से में रेलगाड़ी को रेलवे पुल से तेजी से ले गया और राया स्टेशन पार करते ही उसने रेलगाड़ी की रफ्तार एकदम तेज कर दी तथा बहुत तेज गति से पुल के अंदर गाड़ी घुसा दी जिससे इतना बड़ा हादसा हुआ था. सुबह के सन्नाटे में इस भयंकर दुर्घटना में चीख पुकार की आवाज दूर दूर तक सुनी गयी. चारों ओर हाहाकार मच गया.

सैकड़ों लोग इस दुर्घटना का शिकार हुए चारों ओर खून ही खून बिखर गया. पूरी गाड़ी के डिब्बों की छतें यहां तक कि खिड़की-दरवाजे खून से लाल हो गए. उल्लेखनीय है कि पहले इस पुल पर सड़क भी थी. रेल और सड़क एक साथ होने के चलते सड़क के ऊपर बस, कार, ट्रक, तांगा आदि सभी वाहन गुजरते थे. कोई अन्य पुल उस समय यमुना पर नहीं था. रेल के गुजरते वक्त सड़क को बंद कर दिया जाता था.



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