2027 के महासंग्राम की पूरी बिसात…क्या ‘धर्म’ पर भारी पड़ेंगे ये सारे मुद्दे?
नई दिल्ली. भारत की राजनीति हमेशा से ही अनिश्चितताओं और तेजी से बदलते नैरेटिव के लिए जानी जाती है. साल 2026 अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है. देश में मौजूदा राजनीतिक हालात, संसद में कामकाज और पक्ष-विपक्ष में नोकझोंक से पता चल रहा है कि आने वाले दिनों में भी ये कम नहीं होने वाला है. ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें अब सीधे साल 2027 में होने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों पर टिक गई हैं. चुनावी रणनीतिकारों के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या आने वाले चुनावों में पारंपरिक रूप से चलने वाला ‘धर्म’ का कार्ड काम करेगा, या फिर इस बार आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे जैसे एलपीजी, पेट्रोल-डीजल की कीमतें और सरकार की नई ईंधन नीति e-20 मुख्य भूमिका निभाएंगे?
साल 2027 भारतीय राजनीति के लिए एक ‘मिनी लोकसभा चुनाव’ की तरह होने जा रहा है. 2027 में जिन-जिन राज्यों में शह और मात का खेल होगा और वहां की जनता के मुद्दे 2029 का रुख तय कर सकते हैं. साल 2027 में भारत के कुल 7 राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, जहां चुनाव कराए जाएंगे. देश का सबसे बड़ा सियासी सूबा यूपी में भी चुनाव होंगे, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने सत्ता बचाने की चुनौती होगी. पंजाब में आम आदमी पार्टी के भगवंत मान अपनी सरकार की लोकप्रियता की परीक्षा देंगे. बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ गुजरात में भी अजेय रथ को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी. वहीं उत्तराखंड और गोवा में बीजेपी की सरकारें वापसी की उम्मीद के साथ उतरेंगी. मणिपुर और हिमाचल प्रदेश में भी साल के अंत में नवंबर के आसपास चुनाव होंगे, डहां कांग्रेस अपनी सत्ता बचाने के लिए जंग लड़ेगी.
साल 2027 भारतीय राजनीति के लिए एक ‘मिनी लोकसभा चुनाव’ की तरह होने जा रहा है?
एलपीजी, पेट्रोल-डीजल और e-20: क्या ये बनेंगे गेम चेंजर?
देश के मौजूदा हालात देखें तो मध्यम वर्ग और ग्रामीण आबादी के लिए ईंधन की कीमतें सीधे उनके बजट को प्रभावित कर रही हैं. रसोई गैस की कीमतें सीधे आधी आबादी के मूड को तय करती हैं. वहीं, पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों से माल ढुलाई महंगी होती है, जो हर छोटी-बड़ी चीज की महंगाई बढ़ा देती है. विपक्ष इस बार इसे सबसे बड़ा हथियार बनाने की तैयारी में है. वहीं e-20 20% एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल का मुद्दा भी क्या विपक्ष के एजेंडे में रहेगा. सरकार देश में तेजी से e-20 ईंधन को बढ़ावा दे रही है. हालांकि यह पर्यावरण और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए बेहतरीन कदम है, लेकिन पुरानी गाड़ियों के इंजनों पर इसके प्रभाव और माइलेज में आने वाली कथित कमी को लेकर वाहन चालकों और खासकर युवाओं के बीच एक नई बहस छिड़ी हुई है.
बेरोजगारी और भ्रष्टाचार बनाम धर्म, किसका पलड़ा रहेगा भारी?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो 2027 के चुनावों में वैचारिक और जमीनी मुद्दों के बीच एक त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में युवाओं के बीच पेपर लीक की घटनाएं और सरकारी नौकरियों में देरी एक बहुत बड़ा घाव है. सपा-कांग्रेस इसे मुख्य मुद्दा बनाकर युवाओं को लामबंद कर सकती है. साथ ही स्थानीय स्तर पर नौकरशाही की मनमानी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार हमेशा से एंटी-इनकंबेंसी को हवा देता है. पंजाब में ‘आप’ और यूपी में ‘भाजपा’ को अपने जमीनी स्तर के भ्रष्टाचार के आरोपों से निपटना होगा.
धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण ओवैसी के ‘MIM फॉर्मूले’
बीजेपी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे राम मंदिर या मथुरा-काशी के मुद्दे के कारण धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता. हालांकि, अब जनता सिर्फ भावनात्मक मुद्दों के बजाय ‘जेब और पेट’ के सवालों पर ज्यादा ध्यान दे रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर आर्थिक मोर्चे पर जनता को राहत नहीं मिली, तो एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर बेहद आक्रामक रूप से काम करेगा. उत्तर प्रदेश में बीजेपी पिछले दो कार्यकाल से सत्ता में है, ऐसे में स्थानीय विधायकों और जमीनी स्तर पर प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ नाराजगी उभर सकती है. यही स्थिति पंजाब में आम आदमी पार्टी के साथ भी है, जहां कानून-व्यवस्था और नशा मुक्ति के वादों पर जनता दोबारा हिसाब मांगेगी.
कुलमिलाकर यदि विपक्षी दल बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दे को पूरी तरह भुनाने में कामयाब रहे और सत्ताधारी दल केवल धार्मिक एजेंडे के भरोसे रहे, तो 2027 के नतीजे कई राज्यों में चौंकाने वाले हो सकते हैं. सरकार को इस सत्ता विरोधी लहर से बचने के लिए चुनाव से ठीक पहले ईंधन और गैस की कीमतों में कटौती जैसे बड़े लोक-लुभावन कदम उठाने पड़ सकते हैं.