22 दिन की मेहनत, 10 हजार का खर्च… बना ऐसा ताजिया जिसे देख हर कोई रह गया दंग!
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मिर्जापुर के मंसूर आलम ने मुहर्रम पर 5700 कागज के ग्लास और थर्माकोल से अनोखा ताजिया बनाया. 22 दिनों की मेहनत और 10 हजार रुपये खर्च कर तैयार यह ताजिया श्रद्धा, कला और नवाचार का सुंदर उदाहरण है.
हाइलाइट्स
- मुहर्रम का पर्व शोक और श्रद्धा का प्रतीक है
- ताजिया में दिखी मेहनत और सृजनात्मकता
- पिछले साल माचिस की तीलियों से बना था ताजिया
ताजिया में दिखी मेहनत और सृजनात्मकता
मंसूर आलम ने इस वर्ष करीब 5700 कागज के ग्लासों को थर्माकोल और फेविकिक की मदद से जोड़कर यह अनूठा ताजिया तैयार किया है. इस काम में उन्हें लगातार 22 दिनों की मेहनत लगी, जिसमें उनका परिवार, विशेषकर बच्चे, सहयोगी बने.
मंसूर आलम की कला कोई नई नहीं है. पिछले वर्ष उन्होंने 30 हजार माचिस की तीलियों से ताजिया बनाया था, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचे थे. उनकी रचनात्मकता हर साल कुछ नया और अलग करने की प्रेरणा देती है.
दिल से निकली चाहत, बन गया कलात्मक नमूना
लोकल 18 की टीम से खास बातचीत करते हुए मंसूर आलम बताते हैं कि हमारी इच्छा रहती है कि हर वर्ष कुछ अलग और खास ताजिया बनाएं ताकि हुसैन की याद में लोगों को एक नया संदेश और प्रेरणा मिले. ताजिया तैयार करने में लगभग 10 हजार रुपये का खर्च आता है, लेकिन इसके पीछे उनका भावनात्मक जुड़ाव और श्रद्धा ही सबसे बड़ा कारण है.
एक कारीगर, एक श्रद्धा, और एक संदेश
कालीन बुनाई कर आजीविका चलाने वाले मंसूर आलम ने यह साबित कर दिया कि सिर्फ साधनों से नहीं, बल्कि भावना और समर्पण से भी कलाकृति गढ़ी जाती है. उनका ताजिया न सिर्फ धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि रचनात्मकता और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत मिसाल भी है.