335 अध्याय, 18000 श्लोक….श्रीमद्‌ भागवत में राधा नाम का जिक्र क्यों नहीं है? क्या है रहस्य

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335 अध्याय, 18000 श्लोक….श्रीमद्‌ भागवत में राधा नाम का जिक्र क्यों नहीं है? क्या है रहस्य


नई दिल्ली. ब्रज का नाम आते ही राधा रानी का नाम मन में जरूर आता है. ‘राधे-कृष्ण’; का उच्चारण यहां की परंपरा है. ब्रज की हवाओं में, कण-कण में राधा रानी हैं. फिर सवाल उठता है कि श्रीमद्भागवत में राधा रानी का नाम क्यों नहीं है? राधा राधोपनिषद हैं, राधा रानी का जिक्र कई पुराणों में है, वेद-उपनिषद में भी उनका जिक्र है. ब्रह्म वैवर्त पुराण के प्रकृति खंड के 48वें अध्याय में भगवती राधा के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि श्रीमद्भागवत में 335 अध्याय, 18000 श्लोक, 12 स्कंद भागवत जी में विराजमान हैं लेकिन पूरे ग्रंथ में राधा का नाम कहीं पर नहीं लिखा.

दरअसल, श्राप के कारण तक्षक नाग के काटने के कारण राजा परीक्षित की 7 दिन में मौत होने वाली थी. शुकदेव महाराज ने उन्हें मोक्ष दिलवाने के लिए 7 दिन में श्रीमद्‌ भागवत कथा सुनाई थी. पूरी कथा में उन्होंने कहीं भी राधा नाम का जिक्र नहीं किया.

ज्ञानियों ने, देवताओं ने, कई महापुरुषों ने कई बार इस सवाल का जवाब जानना चाहा है. फिर सवाल उठता है कि राधा गोविंद क्या हैं? राधा माधव क्या हैं? राधे श्याम क्या हैं? हां! भागवत में अगर कहीं उनके नाम का जिक्र भी हुआ है तो वो सिर्फ प्रतीकात्मक है. संकेत हैं, रहस्य हैं.

पौराणिक मान्यता के मुताबिक, एक बार देवताओं ने भी यही प्रश्न पूछा था तो शुकदेव जी ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि ‘अपने गुरु का नाम कैसे लें? जैसे ही राधा नाम जीभ पर आता है, समाधि लग जाती है. ध्यान में चले जाते हैं. एक बार अगर मेरी समाधि लग गई तो फिर वर्षों तक खुलेगी नहीं. फिर कथा कौन सुनाएगा? फिर परीक्षित का तारण कौन करेगा? परीक्षित को मोक्ष कौन देगा? मुझे 7 दिन तक कथा सुनानी है. मैं होश में रहूं. मैं ध्यान में ना चला जाऊं. राधा तो रस का नाम है. राधा समाधि का नाम है. अगर एक बार भी राधा का नाम मेरी जिह्वा पर आ गया तो रस, आनंद, प्रकाश, समाधि में मेरा मन डूब जाएगा.’

ऐसे प्रकट हुईं राधा रानी

एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है. इसके मुताबिक, एक बार देवताओं ने भगवान विष्णु के चरणों में प्रार्थना की. वैसे तो यह प्रार्थना भगवान ब्रह्मा जी की थी. भगवान ब्रह्मा ने कहा, ‘हमने आपके दशावतवार देखे हैं. उनके रहस्य के हम ज्ञाता हैं, लेकिन आपका मूल रूप देखना चाहते हैं. हम आपकी निजता, आपकी सत्ता, आपके स्वरूप, आपके एकांतिक रूप का दर्शन करना चाहते हैं.’ भगवान नारायण ने कहा कि यह आप चाहते हैं या कोई और? भगवान ब्रह्मा बोले कि महादेव भी यह चाहते हैं. भगवान महादेव शंकर ने कहा कि इंद्रदेव, वरूण, यम आदि सभी देवता यह चाहते हैं. यह सुनकर भगवान नारायण बहुत प्रसन्न हुए और बोले कि मैं प्रयास करता हूं यह बताने का कि मैं कौन हूं? थोड़ी देर बाद भगवान के अंदर से दिव्य प्रकाश स्फुटित हुआ. उसमें शील, सौंदर्य और माधुर्य, आनंद, अनुराग दिखाई दिया. सभी देवतागण आह्लादित हो गए. उन्होंने कहा कि भगवान इसको कोई रूप दीजिए. पता तो चले कि यह कौनसा रूप है? भगवान नारायण बोले यही मेरा रूप है. मैं इसी से सृष्टि की रचना करता हूं. फिर थोड़ी देर में भगवान नारायण के अंदर से एक सुंदरी काया, 16 वर्ष की एक दिव्य नारी निकली. देवताओं ने पूछ यह कौन है?

इसलिए राधा नाम पड़ा

भगवान ने कहा, ‘यह मेरा सौंदर्य, माधुर्य रूप है. भगवान बोले कि इसका नाम राधा है. मैं इन्हीं के कारण ईश्वर हूं. यह आनंद हैं. यह तापसी हैं. मधुरा हैं, मंगला हैं. कल्याणी हैं, जया हैं, परा, पर्या, सपर्या, अपर्या हैं. यह मंगलाय हैं, तारिणी हैं. यह ललिता हैं. राज राजेश्वरि हैं. यह परांबका हैं, ना केवल यह मेरी सेविका हैं, बल्कि स्वामिनी भी हैं. यह मेरी आराध्या हैं, यह मेरे भीतर निवास करती हैं. इनके बिना मैं आधा हूं, इसलिए इनका नाम राधा है. यह मेरी शक्ति हैं, धीरा हैं, गंभीरा है, क्षम्या है, मौना हैं. करुणाशीला हैं. शुकदेव मुनि की गुरु राधा हैं. शुकदेव मुनि ने दीक्षा राधा से ली. रस की, आनंद की दीक्षा. माधुरी की दीक्षा.’

शुकदेव की गुरु थीं राधिका

महादेव शंकर ने पूछा कि यह प्रकट तो हो गई हैं लेकिन किस लोक में जाएंगी? इस पर भगवान नारायण ने कहा, ‘यह मूलत: कल्याणी हैं, जगदंबिका हैं, चूंकि इनका प्राकट्य हो गया है इसलिए द्वापर युग की लीलाओं में मेरा साथ देंगी.’

ऐसे राधा प्रकट हुईं. संकेत वन में ब्रह्मा जी ने महादेव शंकर भगवान की उपस्थिति में उनका विवाह करा दिया था. राधिका मौन रहीं. भागवत में उल्लेख नहीं हैं. राधिका शुकदेव की गुरु हैं.

जगद्‌गुरु श्रीकृपालु महाराज ने अपने एक प्रवचन के दौरान कहा था, ‘कुछ लोग कहते हैं कि भागवत में 18000 श्लोक हैं लेकिन राधा का नाम नहीं हैं. राधा के पर्यायवाची तमाम नाम जैसे रमा, ब्रजसुंदरी नाम का जिक्र है. दरअसल, शुकदेव को यह वरदान था कि अगर वो एक बार भी राधा का नाम बोल देंगे तो छह माह के लिए समाधि में चले जाएंगे. अगर छह माह के लिए शुकदेव समाधि में चले जाते तो परीक्षित का उद्धार कैसे होगा. उनको तो 7 दिन में तक्षक डस लेगा. इसलिए शुकदेव ने राधा नाम छिपा लिया. राधा श्रीकृष्ण की भक्ति करती हैं और श्रीकृष्ण राधा की भक्ति क रते हैं. दोनों के शास्त्रों में प्रमाण हैं. ब्रह्म बैवर्त पुराण में इसका उल्लेख है कि जिनकी चरण धूल भगवान श्रीकृष्ण अपने सिर पर रखते हैं, वो राधा हैं.’

भागवत राधा रानी के नाम के बाहर नहीं लेकिन…

वेणुगोलाप दास जी महाराज का कहना है कि ‘भागवत राधा रानी के नाम के बाहर नहीं है. अक्षर-अक्षर में, पद-पद में, श्लोक-श्लोक में श्रीजी समाई हुई हैं पर भागवत की एक मर्यादा है. सनातन धर्म की एक मर्यादा है. घर में बड़े पुत्र का नाम माता नहीं लेती हैं, अपने पति का नाम नहीं लेतीं. धार्मिक मान्यता है कि बड़े पुत्र या पति का नाम लेने पर आयु क्षीण होती है. शास्त्रों में नियम है कि गुरु का भी नाम नहीं लेना चाहिए. ऐसे में शुकदेव जी भागवत में राधा रानी का नाम कैसे ले लेते?’



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