कभी जिन पौराणिक वनों के बारे में किताबों में पढ़ा था, अब असल में देख सकेंगे!
मथुरा: श्रीकृष्ण की पावन भूमि ब्रज में मौजूद पौराणिक वनों को अब नया जीवन दिया जाएगा. उत्तर प्रदेश तीर्थ विकास परिषद ने इन वनों को फिर से जीवंत करने की तैयारी शुरू कर दी है. इसके लिए वन विभाग से ऐसे वनों की सूची मांगी गई है, जो धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से खास माने जाते हैं. इस योजना के तहत लोगों को उन वनों के दर्शन का अनुभव मिलेगा, जिनका उल्लेख पुराणों में मिलता है. सरकार ने इस कार्य के लिए तीन चरणों में योजना बनाई है, जिसकी लागत करीब 85 करोड़ रुपये आंकी गई है.
तीन चरणों में पूरा होगा काम
ब्रज क्षेत्र को भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की भूमि माना जाता है. यहां के हर कण में राधा-कृष्ण की महक बसती है. इसी धरती पर करीब 137 पौराणिक वन हैं, जिन्हें वन विभाग ने पहले ही संरक्षित कर रखा है. अब इन वनों में से 37 वनों को खास तौर से चुना गया है, जिन्हें जीवंत रूप में विकसित किया जाएगा. इन वनों का उल्लेख न केवल धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मिलता है, बल्कि कई भक्तों की आस्था से भी ये जुड़े हैं. जिला वन अधिकारी रजनीकांत मित्तल से बात की, तो उन्होंने बताया कि यह काम तीन चरणों में पूरा किया जाएगा. योजना पूरी तरह वन विभाग के जरिए लागू होगी, और इसका उद्देश्य ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को संरक्षित करना है.
इन पेड़ो को मिलेगा नया जीवन
इस योजना के तहत सुनरख बांगर (वृंदावन), अहिल्यागंज बांगर (मथुरा), धरोरा बांगर (मथुरा), जतीपुरा-बिछुवां, सकीतरा-चंद्रावली वन, राधाकुंड, गोवर्धन, नंदगांव, कामेर-बिहरवन, बैठान कलां-कोकिलावन, गाज़ीपुर-संकेतवन, कोटवन, आझाई खुर्द-सौरभी वन, शेरनगर, प्रेम वन, खेरोल-मयूर वन, कुरकंडा-गंधगर्व वन, कोयला अलीपुर-ब्रह्म वन, सलेमपुर फरह-अप्सरा वन, बजरहा-अगरयाला, नारद वन, कृष्ण वन, चिपन वैन, रूपनगर-नन्द प्रवचन, अजनौथी-शिक्षा वन, बरौध खादर-गुलालपुर, कराह वान-रैंक वन, भस्मऊ खार-ललिता ग्राम, पीरपुर बांगर-वृषभानपुर, तारशी-तालवन, खैरा-खिदरवन, छारी/मत हरमुला-भांडीरवन, बरसाना, पड़रवां, ऊंचागांव-कुमुदवन, करहला, मैल, बरहरा बांगर, बछावन, अजनौक, साही, सिहोरा, लोहवन, महावन, गोकुल बांगर, गोकुल इन पौराणिक पेड़ो को नया जीवन मिलेगा. इन सभी वनों को न सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से सजाया जाएगा, बल्कि वहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी, ताकि वे प्रकृति के साथ-साथ आध्यात्मिक शांति का अनुभव भी कर सकें.
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