Farrukhabad News: आधुनिकता में लौटी परंपरा, जिंदगी में भी नई रोशनी लेकर आई कुल्‍हड़ वाली चाय,जानें कैसे?

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Farrukhabad News: आधुनिकता में लौटी परंपरा, जिंदगी में भी नई रोशनी लेकर आई कुल्‍हड़ वाली चाय,जानें कैसे?


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Farrukhabad News: यूपी के फर्रुखाबाद में कुम्हार समुदाय की जिंदगी एक बार फिर कुल्हड़ वाली चाय के सहारे रफ्तार पकड़ रही है. कभी मिट्टी के बर्तनों के चलन में कमी आने से यह परंपरागत धंधा लगभग बंद हो गया था, लेकिन बड़े होटलों और शहरों में कुल्हड़ की बढ़ती मांग ने इनकी किस्मत बदल दी.

फर्रुखाबाद. चाय भारतीय जीवनशैली का अहम हिस्सा है, लेकिन जब यही चाय मिट्टी के कुल्हड़ में मिलती है, तो उसका स्वाद और भी लाजवाब हो जाता है. यही कुल्हड़ आज न सिर्फ चाय प्रेमियों की पसंद बन चुके हैं, बल्कि कुम्हार समुदाय की जिंदगी में भी नई रोशनी लेकर आए हैं. एक समय मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों का पारंपरिक धंधा धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर पहुंच गया था, लेकिन आधुनिक दौर में कुल्हड़ वाली चाय का ट्रेंड लौटने से इनकी खुशियां फिर से लौट आई हैं. कभी घर-घर में मिट्टी के घड़े और बर्तन इस्तेमाल होते थे, लेकिन प्लास्टिक और स्टील के बढ़ते प्रयोग ने कुम्हारों को मजबूर कर दिया कि वे अपना पुश्तैनी काम छोड़कर दूसरे रोजगार अपनाएं. हालांकि जब से बड़े-बड़े होटलों और चाय दुकानों में कुल्हड़ वाली चाय का चलन शुरू हुआ है, तब से मिट्टी के प्याले की मांग तेजी से बढ़ी है. इसका सीधा फायदा कुम्हारों को मिल रहा है और उनके चाक अब लगातार घूम रहे हैं.

पारंपरिक काम में लौटे कुम्हार

फर्रुखाबाद के सुनहरी गली में रहने वाले कई कुम्हारों ने दोबारा अपने पुराने धंधे को अपनाया है. पहले जब कुल्हड़ की बिक्री नहीं होती थी, तो गरीबी से जूझते इन कारीगरों को मजदूरी या दूसरे पेशों में जाना पड़ा. लेकिन अब चाय विक्रेता और होटल व्यवसायी खुद गांवों में आकर इनसे कुल्हड़ खरीद रहे हैं. यही वजह है कि जिन हाथों ने कभी यह धंधा छोड़ दिया था, अब वही हाथ फिर से मिट्टी को आकार देने लगे हैं. यहां के कुम्हार रोजाना 200 से 400 प्याले बनाने लगे हैं. पूरे इलाके में प्रतिदिन करीब 2 से 3 हजार कुल्हड़ बिक रहे हैं. प्रति कुल्हड़ की कीमत 1.5 से 2 रुपये है. यानी एक कुम्हार रोजाना 3 से 4 हजार रुपये तक कमा लेता है. यह आय उनके लिए जीवन यापन का बड़ा सहारा बन गई है.

मेहनत और संतोष का संगम

कुम्हार बताते हैं कि कुल्हड़ बनाने का काम आसान नहीं है. तपती धूप में चाक घुमाकर मिट्टी को आकार देना और उसे पकाना मेहनत का काम है. लेकिन जब यही कुल्हड़ शहर की दुकानों पर बिकते हैं और लोग मिट्टी की खुशबू वाली चाय का आनंद लेते हैं, तो कारीगरों की मेहनत सफल हो जाती है. कुल्हड़ वाली चाय सिर्फ एक फैशन ट्रेंड नहीं, बल्कि यह परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम है. यह ट्रेंड कुम्हार समुदाय की आर्थिक हालत को मजबूत कर रहा है. लोग न सिर्फ स्वाद और स्वास्थ्य के लिहाज से कुल्हड़ वाली चाय को पसंद कर रहे हैं, बल्कि इससे मिट्टी के बर्तनों की पुरानी संस्कृति को भी बढ़ावा मिल रहा है.

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आधुनिकता में लौटी परंपरा, जिंदगी में भी नई रोशनी लेकर आई कुल्‍हड़ वाली चाय



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