Meerut News: अब नदियों की जिंदगी होगी आसान, जानें क्‍या है जिंक और सिल्वर नैनो पार्टिकल्स

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Meerut News: अब नदियों की जिंदगी होगी आसान, जानें क्‍या है जिंक और सिल्वर नैनो पार्टिकल्स


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Break on Water Pollution: मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग में प्रदूषित जल को शुद्ध करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मिली है. प्रोफेसर संजीव कुमार शर्मा ने जिंक ऑक्साइड और सिल्वर नैनो पार्टिकल्स की मदद से एक ऐसी विधि विकसित की है, जो औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले एंटीबायोटिक मिश्रित जल को कार्बन डाइऑक्साइड और लवणों में बदल देती है

मेरठ. औद्योगिक इकाइयां अक्सर यह दावा करती हैं कि वे आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके नदियों और तालाबों में दूषित जल को पहुंचने से रोकती हैं. लेकिन हर साल सच्चाई इन दावों से उलट सामने आती है. फैक्ट्रियों से निकलने वाला केमिकल और एंटीबायोटिक मिश्रित पानी नदियों की सेहत बिगाड़ रहा है. इस गंभीर समस्या को देखते हुए चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के भौतिक विज्ञान विभाग में एक महत्वपूर्ण शोध सामने आया है. विश्वविद्यालय परिसर में प्रोफेसर संजीव कुमार शर्मा के निर्देशन में जिंक ऑक्साइड और सिल्वर नैनो पार्टिकल्स की मदद से एक अनोखी विधि तैयार की गई है. यह तकनीक औद्योगिक इकाइयों, खासकर फार्मा और पेस्टिसाइड फैक्ट्रियों से निकलने वाले एंटीबायोटिक युक्त पानी को शुद्ध करने में मदद करेगी. प्रो. शर्मा के अनुसार, यह तकनीक आर्टिफिशियल फोटोसिंथेसिस की तरह काम करती है. यानी पानी में मौजूद एंटीबायोटिक रसायनों को यह कार्बन डाइऑक्साइड और लवणों में बदल देती है. इस प्रक्रिया से पानी न सिर्फ साफ होता है, बल्कि उसमें भोजन और ऑक्सीजन का निर्माण भी संभव होता है. यह भविष्य में एंटीबायोटिक प्रदूषण से निपटने का स्थायी और किफायती विकल्प साबित हो सकता है.

अभी लैब में सफल, अब डिवाइस बनेगी

प्रोफेसर संजीव कुमार शर्मा ने बताया कि इस शोध पर आधारित रिसर्च पेपर एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुका है. गौरतलब है कि यह सीसीएसयू का पहला पेपर है जिसे इस विषय पर जगह मिली है. फिलहाल यह तकनीक प्रयोगशाला में सफल साबित हुई है, और अब अगले चरण में इसे डिवाइस के रूप में विकसित किया जाएगा. आने वाले समय में इस डिवाइस को औद्योगिक गतिविधियों में लागू किया जा सकेगा. यानी फैक्ट्रियों से निकलने वाले वेस्टेज को पहले एक स्थान पर एकत्रित किया जाएगा और फिर उस पर जिंक ऑक्साइड व सिल्वर नैनो पार्टिकल विधि लागू होगी. इसके बाद पानी को शुद्ध कर नदियों और जलस्रोतों में छोड़ा जाएगा.

जल प्रदूषण से बड़ी राहत की उम्मीद

औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले एंटीबायोटिक रसायन आज जल प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह बन चुके हैं. नदियों और तालाबों में गिरने वाले इस पानी से न सिर्फ जलीय जीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि इंसानों के लिए भी यह गंभीर स्वास्थ्य संकट खड़ा कर रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर अपनाई जाती है तो नदियों को प्रदूषण से बड़ी राहत मिल सकती है.

स्थायी समाधान की दिशा में कदम

प्रो. शर्मा का कहना है कि यह तकनीक पूरी तरह टिकाऊ है और सूर्य की रोशनी की मदद से प्राकृतिक तरीके से काम करती है. इस विधि का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें अतिरिक्त ऊर्जा या महंगे रसायनों की जरूरत नहीं होती. आने वाले समय में यदि इसे बड़े पैमाने पर उद्योगों में लागू किया गया, तो जल प्रदूषण की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी.

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