Ballia News: राजमहल से झोपड़ी तक: बलिया का वह राजघराना जो आज दो वक्त की रोटी को तरस रहा है, जानें क्‍या है माजरा

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Ballia News: राजमहल से झोपड़ी तक: बलिया का वह राजघराना जो आज दो वक्त की रोटी को तरस रहा है, जानें क्‍या है माजरा


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Ballia News: बलिया का यह राजघराना हमें यह सीख देता है कि समय के साथ कोई भी परिस्थिति बदल सकती है. ऐश्वर्य और वैभव सदा स्थायी नहीं होते, लेकिन आस्था और विश्वास इंसान को हर मुश्किल में संभाले रखते हैं.

बलिया. आपने कहावत तो सुनी होगी. सब दिन होत न एक समाना”, कभी शान-ओ-शौकत और ऐश्वर्य में डूबा रहने वाला बलिया का एक राजघराना आज दो वक्त की रोटी को तरस रहा है. वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि महलों में रहने वाला वंशज आज गांव के घरों में सेवा करके किसी तरह पेट भर रहा है. यह दर्दभरी दास्तां है नरही थाना क्षेत्र के चौरा गांव निवासी रामप्रवेश लाला की, जो कभी राजघराने के वारिस थे, लेकिन आज भूख और बेबसी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

कभी था 200 बीघा खेत, अब छिन गई रोजी-रोटी

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि रामप्रवेश लाला के परिवार के पास कभी 200 बीघा उपजाऊ खेत हुआ करता था. सुख-सुविधा की कोई कमी नहीं थी. लेकिन समय के साथ हालात बदले और यह ऐश्वर्य एक-एक करके छिनता चला गया. चोरी की घटनाओं, काका रामचंद्र लाला द्वारा जमीन बेचने और कानूनी लड़ाइयों के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई. बचा-खुचा जो कुछ खेत था, उसे भी पड़ोसियों ने धीरे-धीरे हड़प लिया.

सेवा के सहारे चल रहा जीवन

आज हालात ऐसे हैं कि राजघराने का वंशज रामप्रवेश लाला गांव के किसी भी घर में कार्यक्रम होता है तो वहां जाकर सेवा का काम करता है. सेवा के बाद जो भोजन मिल जाता है, उसी से पेट भरता है. कभी-कभी लोग 5 रुपए या 10 रुपए थमा देते हैं, वरना वह खाली हाथ लौट आते हैं. यह वही परिवार है जिसे कभी लोग राजा कहकर पुकारते थे और जिसके दरबार में गरीब अपनी समस्या लेकर पहुंचते थे. रामप्रवेश का एक भाई था, जो कहीं लापता हो गया और आज तक वापस नहीं लौटा. उनकी शादी भी हुई थी, लेकिन पत्नी गहनों और रुपयों के साथ घर छोड़कर चली गई. अकेलेपन और तंगहाली से घिरे इस शख्स के पास अब ना जमीन बची है और ना ही परिवार का सहारा. कभी दूसरों की मदद करने वाला यह परिवार अब खुद गांववालों की मदद का मोहताज है.

मां भवानी में अटूट आस्था

हालांकि तमाम विपत्तियों के बावजूद रामप्रवेश की आस्था आज भी अडिग है. वह हर नवरात्र में विंध्याचल जाकर मां भवानी का दर्शन करते हैं. उनका कहना है कि यात्रा की व्यवस्था कहीं न कहीं से अपने आप हो जाती है और लौटने का इंतजाम स्वयं मां विंध्यवासिनी कर देती हैं. फिलहाल वह दिनभर चाय पीकर काटते हैं और केवल शाम को भोजन करते हैं. राजमहलों और खेत-खलिहानों में पलने वाला यह राजघराना आज दर-दर की ठोकर खा रहा है. जो परिवार कभी ऐश्वर्य की मिसाल था, वह अब चाय और एक वक्त की रोटी पर जी रहा है. रामप्रवेश की जिंदगी इस बात की मिसाल है कि वक्त कभी भी किसी का एक-सा नहीं रहता.

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बलिया का वह राजघराना जो आज दो वक्त की रोटी को तरस रहा है



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