कभी पूरे गांव में गूंजते थे तीज के गीत, अब क्यों है सन्नाटा? जानिए…

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कभी पूरे गांव में गूंजते थे तीज के गीत, अब क्यों है सन्नाटा? जानिए…


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Hariyali Teej 2025: शहरी जीवन की तेज रफ्तार और बदलती जीवनशैली ने हरियाली तीज जैसे त्योहारों को गुमनामी की ओर धकेल दिया है. मथुरा की इंदिरा देवी और रछा अग्रवाल ने पुरानी यादें साझा कीं.

हाइलाइट्स

  • हरियाली तीज का पारंपरिक स्वरूप विलुप्त हो रहा है.
  • शहरी जीवन की तेज रफ्तार ने त्योहारों को गुमनामी में धकेला.
  • महिलाओं के पास अब त्योहार मनाने का समय नहीं है.
मथुरा: सावन का महीना कभी महिलाओं के लिए उल्लास, आस्था और मेल-मिलाप का खास समय हुआ करता था. झूले, लोकगीत, मेंहदी और सोलह श्रृंगार से जुड़ी हरियाली तीज जैसे त्योहार इस मौसम की सबसे सुंदर पहचान थे. लेकिन अब यह त्योहार धीरे-धीरे गुमनामी की ओर बढ़ रहा है. शहरी जीवन की तेज रफ्तार, बदलती जीवनशैली और परंपराओं के प्रति कम होती भावनात्मक जुड़ाव ने इस रंग-बिरंगे पर्व को फीका कर दिया है.

हरियाली तीज का पारंपरिक स्वरूप
उत्तर भारत के कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और हरियाणा में हरियाली तीज बेहद खास महत्व रखती थी. खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में यह त्योहार महिलाओं के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था.

महिलाएं अपने मायके आती थीं, पेड़ों पर झूले डाले जाते थे, हरे परिधान और लहरिया की साड़ियों में सजी महिलाएं हाथों में मेंहदी रचाती थीं. पारंपरिक गीतों की मधुर धुनों के बीच सावन की हरियाली और ठंडी बयार इस माहौल को और खास बना देती थी. शिव-पार्वती की पूजा, तीज माता की कथा, व्रत, जागरण और स्वादिष्ट व्यंजन—यह सब कुछ मिलकर त्योहार को जीवंत बना देते थे. घर-घर में घेवर, मालपुआ, पूड़ी, कचौड़ी और फेनी जैसे पकवान बनते थे. महिलाएं इन्हें न सिर्फ प्रसाद के रूप में चढ़ाती थीं, बल्कि उपहार में भी एक-दूसरे को देती थीं.

बदलते वक्त के साथ कम होता उत्साह
अब वह माहौल नहीं रहा. गांवों में आम या नीम के पेड़ों पर झूले लगना लगभग बंद हो गया है. लोकगीत अब मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में कहीं खो गए हैं. आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने परंपराओं को समय देना मुश्किल कर दिया है. महिलाओं के पास अब न तो व्रत करने का समय है और न ही सामूहिक रूप से त्योहार मनाने का अवसर. त्योहार अब सोशल मीडिया की पोस्ट तक सीमित रह गए हैं.

स्थानीय महिलाओं ने साझा की अपनी भावनाएं
लोकल 18 से बातचीत में मथुरा की इंदिरा देवी और रछा अग्रवाल ने अपनी पुरानी यादें साझा कीं. उन्होंने बताया कि उनके समय में सावन का महीना बेहद खास होता था. महिलाएं बाग-बगिचों में झूला झूलती थीं, हंसी-मजाक होता था, साथ बैठकर गीत गाए जाते थे. मेंहदी की खुशबू और हरे परिधान त्योहार के रंग में चार चांद लगा देते थे. आज वो सब कुछ कहीं पीछे छूट गया है. अब बागों में कोयल की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती और पेड़ों पर झूले भी नजर नहीं आते.
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