भारत का वो आखिरी गांव, जहां से नेपाल सीमा में लेते हैं एंट्री, जानिए सबकुछ

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भारत का वो आखिरी गांव, जहां से नेपाल सीमा में लेते हैं एंट्री, जानिए सबकुछ


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Maharajganj News: यूपी के महराजगंज का सीमावर्ती गांव झूलनीपुर भारत-नेपाल की मिश्रित संस्कृति के लिए जाना जाता है. नेपाल सीमा के पास बसे इस गांव में दोनों देशों की भाषा, खानपान और रहन-सहन की झलक साफ दिखाई देती है. आइए आपको इस गांव और यहां से नेपाल जाने के रास्ते के बारे में बताते हैं.

महराजगंज: उत्तर प्रदेश का महराजगंज जिला देश के आखिरी छोर पर बसा हुआ जिला है, जो पड़ोसी देश नेपाल सीमा साझा करता है. इसके साथ ही जिले का एक बड़ा हिस्सा सीमावर्ती क्षेत्रों में आता है और इन सीमावर्ती क्षेत्रों में जिले की एक बड़ी आबादी रहती है. सीमावर्ती क्षेत्रों में बहुत से गांव ऐसे हैं जो भारत और नेपाल बॉर्डर के एकदम नजदीक हैं, जिनकी वजह से उन्हें आखिरी गांव भी कहा जाता है.

इन्हीं गांवों में से एक है महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र का ‘झूलनीपुर’ गांव, जो भारत-नेपाल बॉर्डर पर स्थित है. यह गांव अपनी अलग भौगोलिक स्थिति और अनोखे पहचान के लिए जाना जाता है. यहां पर भारत और नेपाल दोनों ही देश के लोगों का आवागमन होता है, जिसकी वजह से दोनों ही देश के सांस्कृतिक विशेषताओं का यह एक केंद्र भी है. नेपाल से बिल्कुल नजदीक होने की वजह से यहां पर दोनों ही देशों के संस्कृति, भाषा और रहन-सहन की शैली देखने को मिलती है. यही कारण है कि यह गांव सिर्फ अपने भौगोलिक स्थिति ही नहीं, बल्कि अपने सांस्कृतिक महत्व के लिए भी एक अलग पहचान रखता है.

भारत-नेपाल के बीच रोटी और बेटी का संबंध
महराजगंज जिले का झूलनीपुर गांव जिले के आखिरी गांव में गिना जाता है. यहां से पड़ोसी देश नेपाल को बहुत ही नजदीक से देखा जा सकता है. इसके साथ ही यहां का जीवन दोनों देशों के बीच सामाजिक सामंजस्य से भी चलता आ रहा है. इसके अलावा बात करें तो दोनों ही देश के बीच रोटी और बेटी का भी संबंध है, जो सांस्कृतिक रिश्ते ही नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्ते को भी दर्शाते हैं. इसके साथ ही यहां के लोगों की बोली, पहनावा और खान-पान भी लगभग एक जैसा ही दिखता है.

गांव के आसपास के नेपाल के क्षेत्र में भी ज्यादातर भोजपुरी बोली का प्रभाव दिखता है और बहुत से परिवार ऐसे हैं जो भारत के रहने वाले हैं लेकिन नेपाल में भी छोटा-मोटा व्यवसाय करते हैं. पहले यह क्षेत्र काफी पिछड़ा माना जाता था, लेकिन समय के साथ-साथ यहां विकास कार्य भी देखने को मिल रहे हैं. इसके साथ ही लोगों के जीवन में भी आर्थिक बदलाव हो रहा है. भारत-नेपाल बॉर्डर से नजदीक होने की वजह से अन्य दूसरे गांव की तुलना में यहां का माहौल थोड़ा अलग नजरआता है.

यहां का शांत वातावरण करता है लोगों को आकर्षित
इस गांव के आखिरी छोर पर खड़ा होने पर नेपाल की खूबसूरत वादियों का नजारा भी देखने को मिलता है, जो किसी भी व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है. सीमावर्ती क्षेत्र में होने के कारण यहां के लोगों का जीवन भारत और नेपाल दोनों ही देश की परंपराओं से मिला-जुला देखा जा सकता है.

इसके साथ ही यहां की प्राकृतिक सुंदरता और आसपास की हरियाली और सीमावर्ती क्षेत्र का शांत वातावरण लोगों को बहुत ही पसंद आता है. पहले यह गांव इतना विकसित नहीं था, लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ यह एक चौराहे नुमा विकसित हो चुका है और ज्यादा लोगों का आवागमन भी शुरू हो चुका है.

About the Author

आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.



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