आजम खान: कभी रामपुर के बादशाह.. लखनऊ तक हनक, पर आज हाशिये पर, दूसरी पार्टी में गए तो क्या असर होगा?
साल 2014 में आजम की 7 भैंसें चोरी हुईं तो जैसे उनके रसूख का चरम दिखा. पुलिस ने डॉग स्क्वॉड से लेकर आधे जिले की फोर्स उतार दी और 48 घंटे के भीतर भैंसें मिल भी गईं. आजम ने तंज कसते हुए कहा था कि मेरी भैंसें क्वीन विक्टोरिया से भी मशहूर हो गईं. लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हालात बदले. आजम ने खुलकर सपा सरकार की आलोचना की. राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकें टाल दीं और धीरे-धीरे खुद को अलग करने लगे. पार्टी में दुश्मनों की संख्या भी बढ़ने लगी.
2016 में जब मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव के बीच सत्ता का संघर्ष छिड़ा, तब भी आजम दूरी बनाते रहे. मुलायम के पुराने साथी अमर सिंह की सपा में वापसी ने उनके मन की खटास और गहरी कर दी थी. पार्टी के बड़े आयोजनों से वह गायब रहते और यह आम बात हो चुकी थी. 2017 के बाद जब यूपी और दिल्ली दोनों जगह बीजेपी की सरकार बनी तो आजम के खिलाफ पुराने केस खुलने लगे. आखिरकार 2020 में उन्हें जेल जाना पड़ा. यह वह दौर था जब पार्टी नेतृत्व भी उनसे कटा हुआ नजर आया. 2022 और 2023 के उपचुनावों में रामपुर की सीटें भी हाथ से निकल गईं. यह वही गढ़ था, जिसे आजम अपनी निजी जागीर समझते थे. उनके करीबी आसिम राजा की लगातार हार ने झटका और गहरा कर दिया.
लगभग 23 महीने जेल में रहने के बाद जब 2024 में अखिलेश उनसे मिलने पहुंचे, तब इसे लोकसभा चुनाव की मजबूरी माना गया. हालांकि आजम की सिफारिश पर उनके करीबी को टिकट न मिलना और दूसरे प्रत्याशी का जीत जाना इस बात का इशारा था कि पार्टी की रणनीति अब उनके प्रभाव से परे बन रही है.
उत्तर प्रदेश में लगभग 19-20% मुस्लिम आबादी है और पश्चिमी यूपी में यह संख्या कई सीटों पर निर्णायक होती है. रामपुर, मुरादाबाद, अमरोहा, बिजनौर, बरेली और सहारनपुर जैसे जिलों में मुस्लिम वोटरों की अहमियत सबसे ज्यादा है. आजम लंबे समय तक इस वोट बैंक के सबसे बड़े नेता रहे. रामपुर को उनका किला माना जाता था. यहां उनके नाम पर मुस्लिम वोटरों का एकतरफा झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ होता था. यही वजह है कि भाजपा ने 2022 और 2023 के उपचुनावों में उनकी गैरहाजिरी और जेल में रहने का फायदा उठाकर इस किले को भेद ही दिया.
अब भविष्य के चुनावों में उनका क्या प्रभाव होगा?
अब सवाल यह है कि जेल से बाहर आने के बाद आजम खान भविष्य में क्या करेंगे? वे फिर सक्रिय राजनीति में लौटकर मुस्लिम वोटरों का बड़ा हिस्सा अपने साथ करने की कोशिश करेंगे? खासकर पश्चिमी यूपी में. पर एक मूल बात ये भी है कि पिछले कुछ सालों में उनके ना होने से मुस्लिम वोटरों के भीतर नए चेहरों और विकल्पों की तलाश को तेज हुई है. खुद उन्ही की पार्टी सपा भी अन्य मुस्लिम नेताओं को आगे लाने की कोशिश कर रही है. बात भाजपा की करें तो वह लगातार मुस्लिम बहुल सीटों पर सेंध लगाने की रणनीति बना रही है. ऐसे में उनका प्रभाव अगर सपा के साथ पूरी तरह जुड़ा नहीं रहा तो भविष्य के चुनावों में नतीजे प्रभावित हो सकते हैं.
अब आजम खान के सामने दो विकल्प माने जा रहे हैं. पहला जोकि है सपा में बने रहना, क्योंकि इससे मुस्लिम वोटरों का एक बड़ा हिस्सा सपा के साथ ही रहेगा. आजम की मौजूदगी भाजपा के खिलाफ मुस्लिम वोटों को सपा की ओर समेट सकती है. हालांकि पार्टी के भीतर उनकी भूमिका अब पहले जैसी दमदार तो नहीं होगी.
वहीं दूसरे ऑप्शन के रूप में है किसी अन्य पार्टी में जाना, जैसे बसपा, कांग्रेस, आसपा, आरएलडी या कोई नया मोर्चा बनाना.. लेकिन इसमें नुकसान भी है, क्योंकि इससे मुस्लिम वोटों का बिखराव होगा. सपा को सीधा नुकसान तो होगा, क्योंकि पश्चिमी यूपी में उसके पास आजम जैसा कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा नहीं है. कांग्रेस या अन्य दलों को इससे फायदा जरूर मिल सकता है, क्योंकि आजम के साथ खड़ा वोट बैंक उस दल की ताकत बढ़ा सकता है. सबसे ज्यादा फायदा तो भाजपा को ही मिलेगा, क्योंकि मुस्लिम वोटों के बंटने से उसकी जीत आसान हो सकती है.