चित्रकूट का मिनी खजुराहो! मराठा विरासत बन रही खंडहर, प्रशासन सो रहा है
मराठा काल की स्थापत्य कला की अनमोल निशानी
गणेश बाग का निर्माण मराठा शासक विनायक राव पेशवा ने 19वीं सदी में करवाया था. वे महान योद्धा बाजीराव पेशवा के वंशज थे. इतिहासकारों के अनुसार, यह स्थल न सिर्फ धार्मिक उपासना का केंद्र था, बल्कि इसे आम जनता के विश्राम और राजपरिवार के मनोरंजन स्थल के रूप में भी तैयार किया गया था. शासकगण अपने विशिष्ट मेहमानों को यहां ठहराते और इस रमणीय स्थल की भव्यता से उनका स्वागत करते थे.
गणेश भक्ति की महाराष्ट्रीय छाप
गणेश बाग की दीवारों और शिल्प में गणपति बाप्पा की भक्ति झलकती है. मंदिर की नक्काशी में गणेश जी की अनेक मुद्राएं उकेरी गई हैं, जिनमें महाराष्ट्र की पारंपरिक शिल्पकला की गूंज सुनाई देती है. इन मूर्तियों में श्रद्धा और कला का अद्भुत सामंजस्य है. यही कारण है कि यह स्थल उत्तर भारत में महाराष्ट्र के सांस्कृतिक प्रभाव का एक दुर्लभ उदाहरण माना जाता है.
गणेश बाग केवल स्थानीय या भारतीय पर्यटकों के लिए ही नहीं, बल्कि विदेशी सैलानियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. इंग्लैंड, अमेरिका, जापान जैसे देशों से हर वर्ष सैकड़ों पर्यटक चित्रकूट आते हैं और गणेश बाग की भव्यता, कलात्मकता और ऐतिहासिक महत्ता से रूबरू होते हैं. यहां का शांत वातावरण और अद्भुत नक्काशी उन्हें मोहित कर लेती है.
उपेक्षा के कारण टूटती जा रही विरासत
इतिहास, वास्तुकला और संस्कृति की त्रिवेणी कहे जाने वाले गणेश बाग की स्थिति वर्तमान में चिंता का विषय बन चुकी है. प्रशासनिक लापरवाही, रखरखाव की कमी और पर्यटन के अभाव में यह धरोहर धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होती जा रही है. दीवारों की नक्काशी क्षतिग्रस्त हो रही है, और परिसर में जंगली झाड़ियां उग आई हैं.
संरक्षण की दरकार
ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक मार्गदर्शन की प्रेरणा होती हैं. आवश्यकता है कि शासन और पुरातत्व विभाग इस स्थल के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए ठोस कदम उठाएं, ताकि गणेश बाग जैसी अनमोल धरोहरें न सिर्फ बच सकें, बल्कि आने वाले वर्षों में भी गौरव से सिर ऊंचा कर सकें.