52 सरायों के बीच बसा है यूपी का ये शहर! जिसकी हर गली में छिपी है एक कहानी…
संभल शहर को अगर गौर से देखें, तो यह पूरी तरह से सरायों, यानी पुराने समय में यात्रियों के ठहरने की जगहों के इर्द-गिर्द बसा हुआ है. आज भले ही यह सरायें अपना पुराना रूप और महत्व खोती जा रही हों, लेकिन इनका ऐतिहासिक महत्व आज भी बरकरार है.
संभल में जगह-जगह ऐसे मोहल्ले मिल जाएंगे जिनके नाम सराय शब्द से जुड़े हुए हैं. जैसे तरीम सराय, पंजू सराय, खग्गू सराय, कवालीपुर सराय आदि. यह सभी नाम किसी न किसी ऐतिहासिक सराय के नाम पर रखे गए हैं. इतिहासकार और कल्कि मंदिर के पुजारी महेंद्र शर्मा बताते हैं कि यह शहर असल में 52 सरायों के बीच बसा हुआ है.
इतिहासकार महेंद्र शर्मा बताते हैं कि संभल में 68 तीर्थ, 19 कूप (कुएं), और 52 सराय थीं. उस समय जब धार्मिक श्रद्धालु या पर्यटक संभल आते थे, तो उन्हें ठहरने के लिए किसी होटल या धर्मशाला की जरूरत नहीं होती थी. शहर भर में फैली इन सरायों में उन्हें रुकने की पूरी सुविधा मिलती थी. आज जिस तरह से हम धर्मशाला, गेस्ट हाउस या होटल कहते हैं, पहले समय में उन्हें पुरा और सराय कहा जाता था. जैसे 10 मकानों का एक पुरा होता था, और 20 मकानों का दूसरा पुरा. इस तरह पूरे शहर में ये पुरे और सराय फैले हुए थे.
संभल हमेशा से एक धार्मिक नगरी रहा है. यहां की गलियां मंदिरों और तीर्थस्थलों से भरी हुई हैं. ऐसी जगहों पर स्वाभाविक है कि बाहर से श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं. पहले जब होटल या लॉज जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं, तब यहां की सरायें ही बाहर से आने वाले लोगों को आश्रय देती थीं.
महेंद्र शर्मा बताते हैं कि लोग अपने घरों में सीमित संसाधनों के साथ खुद रहते थे, लेकिन बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को रुकने की जगह देना अपनी जिम्मेदारी मानते थे. यही भावना इस शहर की पहचान बनी.
संभल की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान इतनी मजबूत थी कि यहां देश और विदेश से पर्यटक घूमने आते थे. वे यहां के रहन-सहन, संस्कृति और विरासत को जानना चाहते थे. उस समय किसी गेस्ट हाउस या होटल में नहीं, बल्कि सीधे स्थानीय लोगों के घरों में रुकते थे. घर के मालिक बहुत सीमित दायरे में रहते हुए पर्यटकों के रुकने का प्रबंध करते थे.
इससे एक ओर जहां पर्यटकों को आरामदायक स्थान मिलता था, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी भी चलती थी. यह परंपरा न सिर्फ मानवता का प्रतीक थी, बल्कि एक मजबूत सामाजिक ताना-बाना भी तैयार करती थी.
आज की बदलती दुनिया में जहां आधुनिकता ने अपनी जगह बना ली है, वहीं यह ऐतिहासिक सरायें अब गुमनाम होती जा रही हैं. धीरे-धीरे यह अपने पुराने स्वरूप को खोती जा रही हैं और आज केवल मोहल्लों के नामों तक ही सीमित रह गई हैं.
हालांकि, जो लोग संभल के इतिहास और संस्कृति से जुड़े हैं, वे अब भी इस विरासत को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में जरूरत है कि इन ऐतिहासिक सरायों के महत्व को समझा जाए और उन्हें फिर से जीवित करने के प्रयास किए जाएं.