जब रानी ने बसाई अपनी दुनिया, ऐसे पड़ा ‘रानी की सराय’ का नाम, जाने पूरी कहानी
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आजमगढ़ जनपद का रानी की सराय कस्बा अपने भीतर एक बेहद रोचक और बहुआयामी इतिहास समेटे हुए है, जिसकी जड़ें मुगलकालीन दौर तक जाती हैं. कहा जाता है कि इस क्षेत्र का नामकरण रानी ज्योति कुंवर के नाम पर पड़ा, जिन्होंने अपने पति राजा हरिवंश सिंह से अलग होने के बाद यहां आकर एक सराय, मंदिर और पोखरे का निर्माण कराया और इसी स्थान को अपना निवास बनाया. यही सराय धीरे-धीरे एक बसावट में बदल गई और आगे चलकर “रानी की सराय” के नाम से प्रसिद्ध हो गई.
आजमगढ़. ऐतिहासिक दृष्टि से आजमगढ़ प्रदेश के बेहद महत्वपूर्ण जगहों में से एक है, यहां पर पौराणिक से लेकर मुगलकालीन इतिहास की कई घटनाएं देखने और सुनने को मिलती है. इसी के अंतर्गत कुछ घटनाएं ऐसी भी है जो आजमगढ़ की स्थापना से जुड़ी हुई है. आजमगढ़ जिले की स्थापना यहां का नामकरण और आजमगढ़ की रियासत से ही जुड़ी हुई है. एक घटना ऐसी है जिसकी कहानी अपने आप में बेहद दिलचस्प है. हम बात कर रहे हैं आजमगढ़ के रानी के सराय कस्बे की, जहां पर आजमगढ़ के तत्कालीन राजा की रानी ने अपनी सराय बनाई थी जिसके वजह से इस जगह का नाम रानी की सराय पड़ा और सबसे खास बातें है कि इस जगह की स्थापना के बाद से लेकर आज तक यहां पर कभी भी किसी मस्जिद का निर्माण नहीं हो सका. आजमगढ़ मुख्यालय से तकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रानी की सारी कस्बा ऐतिहासिक रूप से जिले के महत्वपूर्ण जगहों में से एक है. इस जगह के नामकरण की कहानी भी अपने आप में बेहद दिलचस्प बताई जाती है. आजमगढ़ के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं इतिहासकार जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘कुन्द’ जी बताते हैं कि आजमगढ़ का इतिहास 16वीं शताब्दी की शुरुआत से जुड़ा हुआ है. तत्कालीन समय में मुगल बादशाह जहांगीर के दरबारी हुआ करते थे अभिमन्यु सिंह जो उनकी सेना में बेहद तेज तर्रार और बहादुर सिपाही हुआ करते थे, उनकी इसी बहादुरी से प्रसन्न होकर जहांगीर ने उन्हें राजा की उपाधि देते हुए 21 परगनों की जागीरदारी दी थी. इसके बाद उन्होंने जनपद के मेहनगर को अपनी रियासत का केंद्र बनाया था और इसके बाद ही उन्होंने इस्लाम धर्म भी कबूल कर लिया और दौलत खां के नाम से जाने जाने लगे.
राजा ने इस्लाम धर्म किया था कबूल
राजा अभिमन्यु सिंह ने अपने भतीजे हरिवंश सिंह को अपनी रियासत का वारिस बनाया था, ऐसा कहा जाता है कि राजा हरिवंश सिंह एक मुस्लिम लड़की से विवाह कर लेते हैं और इस्लाम धर्म कबूल कर लेते हैं. राजा हरिवंश सिंह का दूसरा विवाह करना और इस्लाम धर्म को कबूल कर लेना उनकी तत्कालीन रानी ज्योति कुंवर को बिल्कुल पसंद नहीं आता है, इसके बाद वह उन्हें छोड़कर चली जाती है और यही से शुरू होता है आज के ‘रानी की सराय’ कस्बे का इतिहास. हालांकि, इतिहासकार का कहना है कि मुसलमानों के साथ उठना बैठना अधिक होने के कारण राजा ने इस्लाम धर्म कुबूल किया था. राजा हरिवंश सिंह को छोड़ने के बाद रानी ज्योति कुंवर ने जिस जगह को अपना नया ठिकाना बनाया. उसे ही आज रानी की सारी के नाम से जाना जाता है. इस जगह पर रहने के दौरान रानी ने रहने के लिए एक सराय बनवाया पोखरा बनवाया और मंदिर का निर्माण भी कराया था जो वर्तमान समय में आज भी मौजूद है. इसी क्रम में रानी के बेटे विक्रमजीत सिंह ने भी इस्लाम धर्म कबूल कर लिया.
इसके बाद विक्रमजीत सिंह के दो बेटे हुए एक का नाम आजम शाह और दूसरे का नाम अजमत शाह पड़ा. आजम शाह ने शहर के कोर्ट मोहल्ले में किले का निर्माण कराया जिसके खंडहर आज भी देखने को मिलते हैं और 1665ई. में उन्होंने आजमगढ़ की स्थापनाकी थी. वही उनके छोटे भाई अजमत शाह ने अजमतगढ़ में अपनी रियासत का संचालन किया था और वहां पर किले का निर्माण कराया था जिसकी वजह से उसे जगह को अजमतगढ़ के नाम से जाना जाता है. वर्तमान में रानी की सराय क्षेत्र जनपद आजमगढ़ मुख्यालय से जुड़ा एक विकसित मार्केट और कस्बे के रूप में जाना जाता है, जहां पर हिंदू और मुस्लिम धर्म के लोग रहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि आजमगढ़ की स्थापना और रानी की सारी के नाम से जाने जाने के बाद से आज तक इस जगह पर कभी भी किसी मस्जिद का निर्माण नहीं हो सका. इसके पीछे भी स्थानीय लोगों के साथ-साथ इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि यह क्षेत्र हिंदू बहुल इलाका था और यहां पर तत्कालीन समय में यहां हिन्दू रानी ज्योति कुंवर की सराय होने के कारण आज तक किसी मस्जिद का निर्माण नहीं हो सका है.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें